1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 28 / Shloka 17 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 28
Shloka 17

Balkand

77 Sarga
22 Shloka
1/28/17
1-Balkand / Sarga 28 Shloka 17
Shloka
किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरतः ।
वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे ॥१-२८-१७॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इस प्रकार उन अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके श्रीरघुनाथजीने चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्रसे मधुर वाणीमें पूछा—‘भगवन्! सामनेवाले पर्वतके पास ही जो यह मेघोंकी घटाके समान सघन वृक्षोंसे भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है? उसके विषयमें जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है॥ १६-१७॥