1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 26 / Shloka 20 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 26
Shloka 20

Balkand

77 Sarga
36 Shloka
1/26/20
1-Balkand / Sarga 26 Shloka 20
Shloka
अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा ॥
ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः ॥१-२६-२०॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

अब वह पत्थरोंकी भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाशमें विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मणपर चारों ओरसे प्रस्तरोंकी वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्रने इस प्रकार कहा—‘श्रीराम! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञोंमें विघ्न डाला करती है। यह अपनी मायासे पुन: प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्याके समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’॥ २०—२२