1-Balkand / Sarga 25
Shloka 20
Shloka
श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप ।पृथिवीं हन्तुमिच्छन्तीं मन्थरामभ्यसूदयत् ॥१-२५-२०॥
Sarga 25 / Shloka 20 Balkand