1-Balkand / Sarga 20
Shloka 5
Shloka
अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि ।यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्ये निशाचरैः ॥१-२०-५॥
Sarga 20 / Shloka 5 Balkand