1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 20 / Shloka 17 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 20
Shloka 17

Balkand

77 Sarga
28 Shloka
1/20/17
1-Balkand / Sarga 20 Shloka 17
Shloka
महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ।
श्रूयते च महाराज रावणो राक्षसाधिपः ॥१-२०-१७॥

Bhashya Content For This Shloka

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

राजा दशरथकी इस बातको सुनकर विश्वामित्रजी बोले—‘महाराज! रावण नामसे प्रसिद्ध एक राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्यके कुलमें उत्पन्न हुआ है। उसे ब्रह्माजीसे मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है; जिससे महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकोंके निवासियोंको अत्यन्त कष्ट दे रहा है। सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनिका औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेरका भाई है॥