1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 2 / Shloka 43 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 2
Shloka 43

Balkand

77 Sarga
43 Shloka
1/2/43
1-Balkand / Sarga 2 Shloka 43
Shloka
तदुपगतसमाससंधियोगं
सममधुरोपनतार्थवाक्यबद्धम् ।
रघुवरकरितं मुनिप्रणीतं
दशशिरसश्क वधं निशामयध्वम् ॥१-२-४३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

महर्षि वाल्मीकिके बनाये हुए इस काव्यमें तत्पुरुष आदि समासों, दीर्घ-गुण आदि संधियों और प्रकृति-प्रत्ययके सम्बन्धका यथायोग्य निर्वाह हुआ है। इसकी रचनामें समता (पतत्-प्रकर्ष आदि दोषोंका अभाव) है, पदोंमें माधुर्य है और अर्थमें प्रसाद-गुणकी अधिकता है। भावुकजनो! इस प्रकार शास्त्रीय पद्धतिके अनुकूल बने हुए इस रघुवर-चरित्र और रावण-वधके प्रसंगको ध्यान देकर सुनो॥ ४३॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥