1-Balkand / Sarga 18
Shloka 55
Shloka
ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि बहुधा मया ।तदद्भुतमभूद् विप्र पवित्रं परमं मम ॥१-१८-५५॥
Sarga 18 / Shloka 55 Balkand