1-Balkand / Sarga 16
Shloka 15
Shloka
दिव्यपायससम्पूर्णां पात्रीं पत्नीमिव प्रियाम् ।प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्यां स्वयं मायामयीमिव ॥१-१६-१५॥
Sarga 16 / Shloka 15 Balkand