1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 15 / Shloka 17 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 15
Shloka 17

Balkand

77 Sarga
34 Shloka
1/15/17
1-Balkand / Sarga 15 Shloka 17
Shloka
वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदम् यथा ।
तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥१-१५-१७॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्णके बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये॥ १६-१७