1-Balkand / Sarga 15
Shloka 17
Shloka
वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदम् यथा ।तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥१-१५-१७॥
Sarga 15 / Shloka 17 Balkand