1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 14 / Shloka 57 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 14
Shloka 57

Balkand

77 Sarga
60 Shloka
1/14/57
1-Balkand / Sarga 14 Shloka 57
Shloka
उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च ।
ततः प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम् ॥१-१४-५७॥

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1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञका पुण्यफल पाकर राजा दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वह यज्ञ उनके सब पापोंका नाश करनेवाला तथा उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाला था। साधारण राजाओंके लिये उस यज्ञको आदिसे अन्ततक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था॥