1-Balkand / Sarga 14
Shloka 48
Shloka
रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप ।निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति ॥१-१४-४८॥
Sarga 14 / Shloka 48 Balkand