1-Balkand / Sarga 14
Shloka 37
Shloka
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः ।यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः ॥१-१४-३७॥
Sarga 14 / Shloka 37 Balkand