1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 13 / Shloka 6 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 13
Shloka 6

Balkand

77 Sarga
41 Shloka
1/13/6
1-Balkand / Sarga 13 Shloka 6
Shloka
ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान् ।
स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान् ॥१-१३-६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होनेतक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा—‘तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो॥