Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 3/30

3/30
Shloka
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥३-३०॥
Shloka Pad
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य अध्यात्म-चेतसा।
निराशीः निर्ममः भूत्वा युध्यस्व विगत-ज्वरः॥३-३०॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझ में अर्पण करके आशा रहित, ममता रहित और सन्ताप रहित होकर युद्ध कर॥ ३०॥ 

Footnote

१. त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय - इन सबके समुदाय का नाम 'गुणविभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्मविभाग' है। 

२. उपर्युक्त 'गुणविभाग' और 'कर्मविभाग' से आत्मा को पृथक् अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्त्व जानना है।