Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 18/4

18/4
Shloka
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥१८-४॥
Shloka Pad
निश्चयम् शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागः हि पुरुष-व्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥१८-४॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

हे पुरुष श्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है॥४॥

Footnote

१. स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिये तथा रो-संकटादि की निवृत्ति के लिये जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किये जाते हैं, उनका नाम 'काम्यकर्म ' है। ,

२. ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर सम्बन्धी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्य कर्म हैं, उन सब में इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम 'सब कर्मों के फल का त्याग' है।