Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 18/17

18/17
Shloka
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८-१७॥
Shloka Pad
यस्य न अहंकृतः भावः बुद्धिः यस्य न लिप्यते।
हत्वा अपि सः इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१८-१७॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मार कर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बँधता है *॥ १७॥

Footnote

जैसे अग्नि, वायु और जल के द्वारा प्रारब्ध वश किसी हिंसा होती देखने में आवे तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थ रहित केवल संसार के हित के लिये ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी हिंसा होती हुई लोक दृष्टि में देखी जाय, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है; क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तवमें अकर्म ही है, इसलिये वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।