Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 18/16

18/16
Shloka
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१८-१६॥
Shloka Pad
तत्र एवम् सति कर्तारम् आत्मानम् केवलम् तु यः।
पश्यति अकृत-बुद्धित्वात् न सः पश्यति दुर्मतिः॥१८-१६॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता॥ १६॥

Footnote

१. जिसके आश्रय कर्म किये जायँ, उसका नाम 'अधिष्ठान' है। 

२. जिन-जिन इन्द्रियादि कों और साधनों के द्वारा कर्म किये जाते हैं, उनका नाम 'करण' है।

३. पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम 'दैव' है। 

४. सत्सङ्ग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिये जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिये।