Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 12/4

12/4
Shloka
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥१२-४॥
Shloka Pad
सन्नियम्य इन्द्रिय-ग्रामम् सर्वत्र सम-बुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्व-भूत-हिते रताः॥१२-४॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सब में समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ ३-४॥