Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 12/14

12/14
Shloka
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१२-१४॥
Shloka Pad
सन्तुष्टः सततम् योगी यत-आत्मा दृढ-निश्चयः।
मयि अर्पित-मनः-बुद्धिः यः मत्-भक्तः सः मे प्रियः॥१२-१४॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख – दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है— वह मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ १३-१४॥

Footnote

१. गीता अध्याय ९ श्लोक २७ में इसका विस्तार देखना चाहिये। २. केवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुष का भगवान् में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान्‌ का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिये ध्यान से "कर्मफल का त्याग" श्रेष्ठ कहा है।