Shrimadbhagavadgita (Geetapress) Shrimad Bhagavadgita / 10/5

10/5
Shloka
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥१०-५॥
Shloka Pad
अहिंसा समता तुष्टिः तपः दानम् यशः अयशः।
भवन्ति भावाः भूतानाम् मत्तः एव पृथक्-विधाः॥१०-५॥

Shrimadbhagavadgita (Geetapress)

हिन्दी
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति - प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति - ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥ ४-५॥

Footnote

१. अनादि उसको कहते हैं कि जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो। 

२. स्वधर्म के आचरण से इन्द्रियादि को तपाकर शुद्ध करनेका नाम 'तप' है।