Shrimad Bhagavadgita Adhyay 4 / Shloka 30

4/30
Shloka
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥४-३०॥
Shloka Pad
अपरे नियत-आहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।
सर्वे अपि एते यज्ञविदः यज्ञ-क्षपित-कल्मषाः॥४-३०॥

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Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार* करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को हैं॥ २९-३०॥ 

Footnote

 गीता अध्याय ६ श्लोक १७ में देखना चाहिये।

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