Shrimad Bhagavadgita Adhyay 18 / Shloka 30

18/30
Shloka
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥१८-३०॥
Shloka Pad
प्रवृत्तिम् च निवृत्तिम् च कार्य-अकार्ये भय-अभये।
बन्धम् मोक्षम् च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥१८-३०॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्ति मार्गको , कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती - वह बुद्धि सात्त्विकी है॥ ३०॥

Footnote

१. 'दीर्घसूत्री' उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता।

२. गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्याग कर भगवदर्पणबुद्धि से केवल लोक शिक्षा के लिये राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।

३. देहाभिमान को त्याग कर केवल सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।

All Shlokas