Shrimad Bhagavadgita Adhyay 15 / Shloka 4

15/4
Shloka
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये।
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५-४॥
Shloka Pad
ततः पदम् तत् परिमार्गितव्यं
यस्मिन् गताः न निवर्तन्ति भूयः।
तम् एव च आद्यम् पुरुषम् प्रपद्ये।
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५-४॥

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1 Bhashyas
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

उसके पश्चात् उस परम-पदरूप परमेश्वर को भली भाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदि पुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिये॥ ४॥

Footnote

९. इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तवमें यह क्षणभङ्गुर और नाशवान् है। २. ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान् हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषय भोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही दृढ़ "वैराग्यरूप शस्त्र" है।

३. स्थावर, जङ्गमरूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादि काल से अज्ञान के द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना ' है।

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