१. इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होनेवाले और यज्ञादिक कर्मों के द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गये हैं।
२. भगवान् की योग माया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान् और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर, केवल परमेश्वर का ही नित्य - निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है।
३. शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-ये पाँचों स्थूल देह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गये हैं।
४. मुख्य शाखारूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों के सहित देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिये उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है।