Shrimad Bhagavadgita Adhyay 13 / Shloka 20

13/20
Shloka
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥१३-२०॥
Shloka Pad
कार्य-कारण-कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः उच्यते।
पुरुषः सुख-दुःखानाम् भोक्तृत्वे हेतुः उच्यते॥१३-२०॥

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1 Bhashyas
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख–दुःखों के भोक्तापन में अर्थात् भोगने में हेतु कहा जाता है॥ २०॥

Footnote

१. श्लोक ५-६ में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है। 

२. श्लोक ७ से ११ तक ज्ञान अर्थात् ज्ञान का साधन कहा है। 

३. श्लोक १२ से १७ तक ज्ञेयका स्वरूप कहा है। 

४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इनका नाम 'कार्य' है।

५. बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा - इन १३ का नाम 'करण' है।

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