Shrimad Bhagavadgita Adhyay 12 / Shloka 13

12/13
Shloka
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१२-१३॥
Shloka Pad
अद्वेष्टा सर्व-भूतानां मैत्रः करुणः एव च।
निर्ममः निरहङ्कारः सम-दुःख-सुखः क्षमी॥१२-१३॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadbhagavadgita (Geetapress) - हिन्दी
Meaning

जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख – दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है— वह मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ १३-१४॥

Footnote

१. गीता अध्याय ९ श्लोक २७ में इसका विस्तार देखना चाहिये। २. केवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुष का भगवान् में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान्‌ का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिये ध्यान से "कर्मफल का त्याग" श्रेष्ठ कहा है। 

All Shlokas