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Samveda Mantra 991

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी यु꣣वा꣢मि꣣मे꣢३ऽभि꣡ स्तोमा꣢꣯ अनूषत । पि꣡ब꣢तꣳ शम्भुवा सु꣣त꣢म् ॥९९१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अग्नी꣣इ꣡ति꣢ । यु꣣वा꣢म् । इ꣣मे꣢ । अ꣣भि꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । अ꣣नूषत । पि꣡ब꣢꣯तम् । श꣣म्भुवा । शम् । भुवा । सुत꣢म् ॥९९१॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी युवामिमे३ऽभि स्तोमा अनूषत । पिबतꣳ शम्भुवा सुतम् ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । युवाम् । इमे । अभि । स्तोमाः । अनूषत । पिबतम् । शम्भुवा । शम् । भुवा । सुतम् ॥९९१॥

Samveda - Mantra Number : 991
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

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Meaning
हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन तथा राजा और सेनापति ! (युवाम्) तुम्हारी (इमे स्तोमाः) ये स्तोत्र (अभि अनूषत) प्रशंसा कर रहे हैं। हे (शम्भुवा) कल्याणकारियो ! तुम (सुतम्) अभिषुत वीररस को (पिबतम्) पीओ ॥१॥
Essence
वीरता और उद्बोधन को प्राप्त करके ही मनुष्य के आत्मा और मन तथा राजा और सेनापति वैयक्तिक एवं सामाजिक उन्नति करने योग्य होते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र और अग्नि के नाम से आत्मा और मन तथा राजा एवं सेनापति का आह्वान किया गया है।

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