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Samveda Mantra 988

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुरुसुतिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त्ति꣢ष्ठ꣣न्नो꣡ज꣢सा स꣣ह꣢ पी꣣त्वा꣡ शिप्रे꣢꣯ अवेपयः । सो꣡म꣢मिन्द्र च꣣मू꣢ सु꣣त꣢म् ॥९८८॥

उ꣣त्ति꣡ष्ठ꣢न् । उ꣣त् । ति꣡ष्ठ꣢꣯न् । ओ꣡ज꣢꣯सा । स꣣ह꣢ । पी꣣त्वा꣢ । शिप्रे꣢꣯इ꣡ति꣢ । अ꣣वेपयः । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । चमू꣡इति꣢ । सु꣣त꣢म् ॥९८८॥

Mantra without Swara
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वा शिप्रे अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ॥

उत्तिष्ठन् । उत् । तिष्ठन् । ओजसा । सह । पीत्वा । शिप्रेइति । अवेपयः । सोमम् । इन्द्र । चमूइति । सुतम् ॥९८८॥

Samveda - Mantra Number : 988
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

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Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नों का विदारण करने में समर्थ जीवात्मन् ! तू (ओजसा सह) तेज के साथ (उत्तिष्ठन्) ऊँचा उठता हुआ (चमू) मन-बुद्धि रूप कटोरों में (सुतम्) निचोड़े गए (सोमम्) वीर-रस को (पीत्वा) पीकर (शिप्रे) जबड़े आदि अङ्गों को (अवेपयः) चलाता है। [जबड़े आदि को चलाना शत्रु के प्रति उग्रभाव के प्रकाशनार्थ होता है] ॥१॥
Essence
मनुष्य अपने आत्मा में वीरता के भावों को तरङ्गित करके, सब विघ्नों का विदारण करके आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं का उच्छेद करे ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा के वीररस-पान का विषय है।

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