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Samveda Mantra 790

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्निं꣢ दू꣣तं꣡ वृ꣢णीमहे꣣ हो꣡ता꣢रं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥७९०॥

अ꣣ग्नि꣢म् । दू꣣त꣢म् । वृ꣣णीमहे । हो꣡ता꣢꣯रम् । वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । वि꣣श्व꣢ । वे꣣दसम् । अस्य꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । सु꣣क्र꣡तु꣢म् । सु꣣ । क्र꣡तु꣢म् ॥७९०॥

Mantra without Swara
अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥

अग्निम् । दूतम् । वृणीमहे । होतारम् । विश्ववेदसम् । विश्व । वेदसम् । अस्य । यज्ञस्य । सुक्रतुम् । सु । क्रतुम् ॥७९०॥

Samveda - Mantra Number : 790
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

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Meaning
प्रथम—आचार्य के पक्ष में। हम (होतारम्) विद्या और आचार के दाता, (विश्ववेदसम्) सम्पूर्ण वाङ्मय के ज्ञाता, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) विद्या-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता, (दूतम्) दुर्गुण, दुर्व्यसन, प्रमाद, आलस्य, दुःख आदि को संतप्त करनेवाले (अग्निम्) तेजस्वी, कर्मनिष्ठ, अग्रनेता आचार्य को (वृणीमहे) गुरुरूप से वरते हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हम (होतारम्) सुराज्य-व्यवस्था से प्रजाओं को सुख देनेवाले, (विश्ववेदसम्) सम्पूर्ण राजनीतिविज्ञान के ज्ञाता, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) राष्ट्र-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता, दूतम् शत्रुओं तथा भ्रष्टाचारियों के संतापक, (अग्निम्) अग्रनेता, कर्मठ, सुयोग्य जन को (वृणीमहे) प्रजा के बीच से राजारूप में चुनते हैं ॥ तृतीय—भौतिक अग्नि के पक्ष में। हम शिल्पविद्या के ज्ञाता विद्वान् लोग (होतारम्) यानों और यन्त्रों में वेगादि गुण को देनेवाले, (विश्ववेदसम्) सब सुख के साधन जिससे प्राप्त होते हैं ऐसे, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) शिल्पयज्ञ के (सुक्रतुम्) सुसम्पादन में साधनभूत, दूतम् यन्त्रकलाओं को गति देनेवाले (अग्निम्) विद्युत् को (वृणीमहे) शिल्पक्रियाओं में प्रयुक्त करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि जगदीश्वर की उपासना से शुभ प्रेरणा पाकर, सुयोग्य, उत्तम शिक्षा देनेवाले आचार्य को वरकर, सब विद्याएँ पढ़कर, सदाचार को स्वीकार करके, विद्युद्-विद्या से शिल्पविद्या की उन्नति द्वारा भू-यान, जल-यान और अन्तरिक्ष-यानों को तथा तरह-तरह के यन्त्रों को बना कर राष्ट्र की उन्नति करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३ पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ आचार्य, राजा और भौतिक अग्नि के पक्ष में व्याख्या करते हैं।

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