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Samveda Mantra 729

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣द्मा꣡ हि त्वा꣢꣯ तुविकू꣣र्मिं꣢ तु꣣वि꣡दे꣢ष्णं तु꣣वी꣡म꣢घम् । तु꣣विमात्र꣡मवो꣢꣯भिः ॥७२९॥

वि꣣द्म꣢ । हि । त्वा꣣ । तुविकूर्मि꣣म् । तु꣢वि । कूर्मि꣢म् । तु꣣वि꣡दे꣢ष्णम् । तु꣣वि꣢ । दे꣣ष्णम् । तु꣣वी꣡म꣢घम् । तु꣣वि꣢ । म꣣घम् । तुविमात्र꣢म् । तु꣣वि । मात्र꣢म् । अ꣡वो꣢꣯भिः ॥७२९॥

Mantra without Swara
विद्मा हि त्वा तुविकूर्मिं तुविदेष्णं तुवीमघम् । तुविमात्रमवोभिः ॥

विद्म । हि । त्वा । तुविकूर्मिम् । तुवि । कूर्मिम् । तुविदेष्णम् । तुवि । देष्णम् । तुवीमघम् । तुवि । मघम् । तुविमात्रम् । तुवि । मात्रम् । अवोभिः ॥७२९॥

Samveda - Mantra Number : 729
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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Meaning
हे सर्वान्तर्यामिन् परब्रह्म ! हम (हि) निश्चयपूर्वक (त्वा) आपको (तुविकूर्मिम्) उत्पत्ति, धारण, पालन आदि बहुत से कर्मों का कर्त्ता, (तुविदेष्णम्) बहुत से पदार्थों तथा सुख आदियों का दाता, (तुवीमघम्) बहुत धनी और (अवोभिः) रक्षाओं के साथ (तुविमात्रम्) सूर्य, चन्द्र, तारामण्डलादि बहुतों को मापनेवाला (विद्म) जानते हैं ॥२॥
Essence
परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को जानकर उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता सबको प्रकट करनी चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में आचार्य से ब्रह्मविद्या सीखे हुए शिष्य ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं।

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