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Samveda Mantra 647

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य꣣ सा꣡त꣢ये हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣢षः꣣ स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥६४७

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ध꣡न꣢꣯स्य । सा꣣त꣡ये꣢ । ह꣣वामहे । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥६४७॥

Mantra without Swara
इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् । स नः स्वर्षदति द्विषः स नः स्वर्षदति द्विषः ॥६४७

इन्द्रम् । धनस्य । सातये । हवामहे । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः ॥६४७॥

Samveda - Mantra Number : 647

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Meaning
(इन्द्रम्) शूरवीर परमैश्वर्यशाली परमेश्वर को हम योगाभ्यासी जन (धनस्य) विवेकख्यातिरूप ऐश्वर्य की (सातये) प्राप्ति के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। कैसे परमेश्वर को? (जेतारम्) जो शत्रुओं और विघ्नों का विजेता, तथा (अपराजितम्) करोड़ों भी शत्रुओं एवं विघ्नों से न हारनेवाला है। (सः) वह विजेता परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूप पञ्च क्लेशों से (अति स्वर्षत्) पार कर दे, (सः) वह अपराजित परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्त्व इन चित्तविक्षेपरूप योगमार्ग के विघ्नों से (अति स्वर्षत्) पार कर दे ॥७॥
Essence
परमेश्वर की ही कृपा से योगाभ्यासी जन योग के विघ्नों को जीतकर विवेकख्याति द्वारा मोक्ष प्राप्त करने योग्य होते हैं ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का आह्वान किया गया है।

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