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Samveda Mantra 40

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥४०॥

अ꣡ग्ने꣢ । वि꣡व꣢꣯स्वत् । वि । व꣣स्वत् । उष꣡सः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । रा꣡धः꣢꣯ । अ꣣मर्त्य । अ । मर्त्य । आ꣢ । दा꣣शु꣡षे꣢ । जा꣣तवेदः । जात । वेदः । वह । त्व꣢म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । दे꣣वा꣢न् । उ꣣षर्बु꣡धः꣢ । उ꣣षः । बु꣡धः꣢꣯ ॥४०॥

Mantra without Swara
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रꣳ राधो अमर्त्य । आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाꣳ उषर्बुधः ॥

अग्ने । विवस्वत् । वि । वस्वत् । उषसः । चित्रम् । राधः । अमर्त्य । अ । मर्त्य । आ । दाशुषे । जातवेदः । जात । वेदः । वह । त्वम् । अद्य । अ । द्य । देवान् । उषर्बुधः । उषः । बुधः ॥४०॥

Samveda - Mantra Number : 40
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

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Meaning
हे (अमर्त्य) स्वरूप से मरणधर्मरहित, (जातवेदः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, ज्ञाननिधि, (अग्ने) प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (त्वम्) आप (अद्य) आज (दाशुषे) धन-धान्य, विद्या आदि का दान करनेवाले मुझे (उषसः) उषा के (चित्रम्) अद्भुत, (विवस्वत्) अज्ञान, दरिद्रता आदि के अन्धकार को दूर करनेवाले (राधः) सत्यरूप अथवा ज्योति-रूप धन को और (उषर्बुधः) उषःकाल में स्वयं जागने तथा अन्यों को जगानेवाले (देवान्) उत्तम विद्वानों तथा दिव्यगुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥६॥
Essence
सब मनुष्य उषःकाल में प्रबुद्ध होनेवाले दिव्यगुणों को हृदय में धारण करते हुए उषा के समान तेज की किरणों से युक्त, प्राणवान्, यज्ञवान्, प्रबोधवान् और सत्यवान् होकर विद्वानों के संग से सदा जागरूक, सदाचारी और धर्मात्मा होवें ॥६॥
Subject
परमेश्वर हमें क्या प्रदान करे, यह कहते हैं।

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