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Samveda Mantra 193

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्वा꣡व꣢तः पुरूवसो व꣣य꣡मि꣢न्द्र प्रणेतः । स्म꣡सि꣢ स्थातर्हरीणाम् ॥१९३॥

त्वा꣡व꣢꣯तः । पु꣣रूवसो । पुरु । वसो । वय꣣म् । इ꣣न्द्र । प्रणेतः । प्र । नेतरि꣡ति । स्म꣡सि꣢꣯ । स्था꣣तः । हरीणाम् ॥१९३॥

Mantra without Swara
त्वावतः पुरूवसो वयमिन्द्र प्रणेतः । स्मसि स्थातर्हरीणाम् ॥

त्वावतः । पुरूवसो । पुरु । वसो । वयम् । इन्द्र । प्रणेतः । प्र । नेतरिति । स्मसि । स्थातः । हरीणाम् ॥१९३॥

Samveda - Mantra Number : 193
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 8;

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Meaning
हे (पुरूवसो) बहुत धनी, (प्रणेतः) उत्कृष्ट नेता, (हरीणाम्) आकर्षणगुणयुक्त पृथिवी-सूर्य आदि लोकों के, अथवा विषयों की ओर ले जानेवाली इन्द्रियों के, अथवा सवारी देनेवाले विमान आदि यानों के (स्थातः) अधिष्ठाता (इन्द्र) परमात्मन्, जीवात्मन् व विद्वन् ! (वयम्) हम मनुष्य (त्वावतः) तुझ जैसे किसी अन्य के न होने के कारण जो तू तुझ जैसा ही है, ऐसे तुझ अद्वितीय के (स्मसि) हो गये हैं ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेष है। ‘त्वावतः’ में ‘कमल कमल के समान है’ इत्यादि के सदृश अनन्वय अलङ्कार है ॥९॥
Essence
संसार में बिखरे हुए सब धनों का स्वामी, सबका नेता, सूर्य-आदि लोकों का अधिष्ठाता, अनुपम परमेश्वर जैसे सबका वन्दनीय है, वैसे ही बहुत से ज्ञान, कर्म आदि धनों का स्वामी, मार्गप्रदर्शक, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय एवं प्राण, मन, बुद्धि आदि का अधिष्ठाता जीवात्मा भी सबसे सेवनीय है। उसी प्रकार वेग से यात्रा करानेवाले विमान आदियों के निर्माण और चलाने में कुशल, विविध विद्याओं में पारङ्गत, शिल्पशास्त्र के वेत्ता विद्वान् भी मनुष्यों द्वारा सेवनीय है ॥९॥ इस दशति में इन्द्र से सम्बद्ध वरुण, मित्र और अर्यमा के रक्षण की प्रार्थना होने से, इन्द्र की गौओं की प्रशंसा होने से, इन्द्र से गाय, अश्व आदि की याचना होने से, इन्द्र की सरस्वती का आह्वान होने से, इन्द्र का स्तुतिगान होने से तथा इन्द्र नाम से राजा, विद्वान्, आचार्य आदि का भी विषय वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवी दशति समाप्त ॥ यह द्वितीय प्रपाठक सम्पूर्ण हुआ ॥ द्वितीय अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र नाम से परमात्मा, जीवात्मा और विद्वान् को सम्बोधन किया गया है।

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