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Samveda Mantra 1803

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुदासः पैजवनः Chhand- शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि꣢꣯ षु विश्वा꣣ अ꣡रा꣢तयो꣣ऽर्यो꣡ न꣢शन्त नो꣣ धि꣡यः꣢ । अ꣡स्ता꣢सि꣣ श꣡त्र꣢वे व꣣धं꣡ यो न꣢꣯ इन्द्र꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । या꣡ ते꣢ रा꣣ति꣢र्द꣣दि꣢꣫र्वसु꣣ न꣡भ꣢न्तामन्य꣣के꣡षां꣢ ज्या꣣का꣢꣫ अधि꣣ ध꣡न्व꣢सु ॥१८०३॥

वि꣢ । सु । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯तयः । अ । रा꣣तयः । अर्यः꣢ । न꣣शन्त । नः । धि꣡यः꣢꣯ । अ꣡स्ता꣢꣯ । अ꣣सि । श꣡त्र꣢꣯वे । व꣣ध꣢म् । यः । नः꣣ । इन्द्र । जि꣡घा꣢꣯ꣳसति । या । ते꣣ । रातिः꣢ । द꣣दिः꣢ । व꣡सु꣢꣯ । न꣡भ꣢꣯न्ताम् । अ꣣न्यके꣡षा꣢म् । अ꣣न् । यके꣡षा꣢म् । ज्या꣣काः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । ध꣡न्व꣢꣯सु ॥१८०३॥

Mantra without Swara
वि षु विश्वा अरातयोऽर्यो नशन्त नो धियः । अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघाꣳसति । या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु ॥

वि । सु । विश्वा । अरातयः । अ । रातयः । अर्यः । नशन्त । नः । धियः । अस्ता । असि । शत्रवे । वधम् । यः । नः । इन्द्र । जिघाꣳसति । या । ते । रातिः । ददिः । वसु । नभन्ताम् । अन्यकेषाम् । अन् । यकेषाम् । ज्याकाः । अधि । धन्वसु ॥१८०३॥

Samveda - Mantra Number : 1803
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 4;

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Meaning
(विश्वाः) सब (अर्यः) आक्रमण करनेवाली; (अरातयः) दान-हीन शत्रु-सेनाएँ और विघ्न-सेनाएँ (सु) पूर्णरूप से (विनशन्त) विनष्ट हो जाएँ, (नः) हमें (धियः) योग की धारणा, ध्यान और समाधियाँ प्राप्त हों। हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (यः) जो शत्रु (नः) हमारा (जिघांसति) वध कर देना चाहता है, उस (शत्रवे) काम, क्रोध आदि शत्रु पर, आप (वधम्) मौत (अस्ता असि) डालनेवाले हो। (या) जो (ते) आपकी (रातिः) दान की प्रवृत्ति है, वह हमारे लिए (वसु) निवासक दिव्य ऐश्वर्य की (ददिः) देनेवाली हो। (अन्यकेषाम्) शत्रुओं की (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ, अर्थात् वे साधनहीन असहाय होकर विनष्ट हो जाएँ ॥३॥
Essence
जैसे राजा वा सेनापति शत्रुओं को मार कर प्रजाओं को धन आदि देता है, वैसे ही अध्यात्ममार्ग में बाधा डालनेवाले विघ्नों और काम, क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करके जगदीश्वर उपासक को दिव्य ऐश्वर्य प्रदान करता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का शत्रु-विनाश और धन देने के गुण का वर्णन है।

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