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Samveda Mantra 1769

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधो वामदेवो वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वा꣡मिच्छ꣢꣯वसस्पते꣣ य꣢न्ति꣣ गि꣢रो꣣ न꣢ सं꣣य꣡तः꣢ ॥१७६९॥

त्वा꣢म् । इत् । श꣣वसः । पते । य꣡न्ति꣢꣯ । गि꣡रः꣢꣯ । न । सं꣣य꣡तः꣢ । स꣣म् । य꣡तः꣢꣯ ॥१७६९॥

Mantra without Swara
त्वामिच्छवसस्पते यन्ति गिरो न संयतः ॥

त्वाम् । इत् । शवसः । पते । यन्ति । गिरः । न । संयतः । सम् । यतः ॥१७६९॥

Samveda - Mantra Number : 1769
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

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Meaning
हे (शवसः पते) अध्यात्म-बल, ब्रह्मबल वा विद्याबल के स्वामी परमेश्वर वा आचार्य ! (गिरः न) वाणियों के समान (संयतः) प्रत्यनशील प्रजाएँ भी (त्वाम् इत्) आपको ही (यन्ति) प्राप्त होती हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे वेदवाणियाँ जगदीश्वर के गुणों का वर्णन करती हैं और पुरुषार्थी प्रजाएँ उसे पाने का यत्न करती हैं, वैसे ही आचार्य की भी वाणियों से स्तुति करनी चाहिए तथा प्रयत्नशील विद्यार्थियों को शिष्यभाव से उसके समीप पहुँचना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर वा आचार्य की महिमा वर्णित है।

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