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Samveda Mantra 1766

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡प्तिं꣢ मृजन्ति वे꣣ध꣡सो꣢ गृ꣣ण꣡न्तः꣢ का꣣र꣡वो꣢ गि꣣रा꣢ । ज्यो꣡ति꣢र्जज्ञा꣣न꣢मु꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् ॥१७६६॥

स꣡प्ति꣢꣯म् । मृ꣣जन्ति । वेध꣡सः꣢ । गृ꣣ण꣡न्तः꣢ । का꣣र꣡वः꣢ । गि꣣रा꣢ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣣ज्ञान꣢म् । उ꣣क्थ्य꣢म् ॥१७६६॥

Mantra without Swara
सप्तिं मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरा । ज्योतिर्जज्ञानमुक्थ्यम् ॥

सप्तिम् । मृजन्ति । वेधसः । गृणन्तः । कारवः । गिरा । ज्योतिः । जज्ञानम् । उक्थ्यम् ॥१७६६॥

Samveda - Mantra Number : 1766
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

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Meaning
(गिरा) वाणी से (गृणन्तः) अर्चना करते हुए (वेधसः) मेधावी (कारवः) स्तोता लोग (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (ज्योतिः) प्रकाश को (जज्ञानम्) उत्पन्न करनेवाले (सप्तिम्) सप्तरश्मि सूर्य के समान विद्यमान सोम परमात्मा को (सृजन्ति) अपने आत्मा में प्रकट करते हैं ॥२॥
Essence
सूर्य के समान प्रकाशक परमेश्वर की उपासना से उपासक के आत्मा में दिव्य ज्योति का प्रकाश फैल जाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताते हें कि कौन कैसे परमेश्वर की आराधना करते हैं।

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