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Samveda Mantra 1726

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡श्वे꣢व चि꣣त्रा꣡रु꣢षी मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मृ꣣ता꣡व꣢री । स꣡खा꣢ भूद꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣षाः꣡ ॥१७२६॥

अ꣡श्वा꣢꣯ । इ꣣व । चित्रा꣢ । अ꣡रु꣢꣯षी । मा꣣ता꣢ । ग꣡वा꣢꣯म् । ऋ꣣ता꣡व꣢री । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । भूत् । अश्वि꣡नोः꣢ । उ꣣षाः꣢ ॥१७२६॥

Mantra without Swara
अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी । सखा भूदश्विनोरुषाः ॥

अश्वा । इव । चित्रा । अरुषी । माता । गवाम् । ऋतावरी । सखा । स । खा । भूत् । अश्विनोः । उषाः ॥१७२६॥

Samveda - Mantra Number : 1726
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

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Meaning
प्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (अश्वा इव) आकाश-व्यापी बिजली के समान (चित्रा) चित्र-विचित्र रंगवाली, (अरुषी) चमकीली, (गवां माता) किरणों की जननी, (ऋतावरी) सत्य नियमवाली (उषाः) उषा (अश्विनोः) आकाश और भूमि की (सखा) सहचरी (अभूत्) हो गयी है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (अश्वा इव) व्याप्त विद्युत् के समान (चित्रा) अद्भुत, (अरुषी) हिंसा न करनेवाली, (गवां माता) अध्यात्म-रश्मियों की माता (ऋतावरी) सत्यमयी (उषाः) ऋतम्भरा प्रज्ञा (अश्विनोः) आत्मा और मन की (सखा) सहचरी (अभूत्) हो गयी है ॥२॥ यहाँ श्लेष और उपमा अलङ्कार हैं ॥२॥
Essence
जैसे अटल नियम से प्रतिदिन उदित होती हुई प्रकाशवती प्राकृतिक उषा आकाश-भूमि में व्याप जाती है, वैसे ही योगमार्ग में सत्यमयी ऋतम्भरा प्रज्ञा योगसाधक के आत्मा और मन को व्याप लेती है ॥२॥
Subject
आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

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