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Samveda Mantra 1657

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१६५७॥

प꣡न्यं꣢꣯पन्यम् । प꣡न्य꣢꣯म् । प꣣न्यम् । इ꣢त् । सो꣣तारः । आ꣢ । धा꣣वत । म꣡द्या꣢꣯य । सो꣡म꣢꣯म् । वी꣣रा꣡य꣢ । शू꣡रा꣢꣯य ॥१६५७॥

Mantra without Swara
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥

पन्यंपन्यम् । पन्यम् । पन्यम् । इत् । सोतारः । आ । धावत । मद्याय । सोमम् । वीराय । शूराय ॥१६५७॥

Samveda - Mantra Number : 1657
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

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Meaning
हे (सोतारः) ज्ञानरस को अभिषुत करनेवाले मनुष्यो ! तुम(मद्याय) आनन्दित किये जाने योग्य, (वीराय) काम-क्रोध आदि षड् रिपुओं को विशेषरूप से प्रकम्पित करनेवाले, (शूराय) शूरवीर जीवात्मा के लिए (पन्यम् पन्यम् इत्) प्रशंसनीय-प्रशंसनीय ही (सोमम्) अध्यात्म ज्ञान-रस को (आ धावत) पहुँचाओ ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि वे प्रशंसा-योग्य ही भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान का आत्मा में सञ्चय करें, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग को भली-भाँति पार कर सकें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १२३ क्रमाङ्क पर भक्तिरस के विषय में की जा चुकी है। यहाँ ज्ञानरस का विषय है।

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