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Samveda Mantra 1603

1875 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भ्या꣢र꣣मि꣡दद्र꣢꣯यो꣣ नि꣡षि꣢क्तं꣣ पु꣡ष्क꣢रे꣣ म꣡धु꣢ । अ꣣व꣡ट꣢स्य वि꣣स꣡र्ज꣢ने ॥१६०३॥

अ꣣भ्या꣡र꣢म् । अ꣣भि । आ꣡र꣢꣯म् । इत् । अ꣡द्र꣢꣯यः । अ । द्र꣣यः । नि꣡षि꣢꣯क्तम् । नि । सि꣣क्तम् । पु꣡ष्क꣢꣯रे । म꣡धु꣢꣯ । अ꣣वट꣡स्य꣢ । वि꣣स꣡र्ज꣢ने । वि꣣ । स꣡र्ज꣢꣯ने ॥१६०३॥

Mantra without Swara
अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु । अवटस्य विसर्जने ॥

अभ्यारम् । अभि । आरम् । इत् । अद्रयः । अ । द्रयः । निषिक्तम् । नि । सिक्तम् । पुष्करे । मधु । अवटस्य । विसर्जने । वि । सर्जने ॥१६०३॥

Samveda - Mantra Number : 1603
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

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Meaning
अग्नि नामक परमात्मा की ही महिमा से (अद्रयः) बादल(अभ्यारम् इत्) आपस में टकराते हैं। तब (अवटस्य) मेघरूप जलभण्डार के (विसर्जने) बरसने पर (पुष्करे) भूमि के सरोवर में (मधु) मधुर वर्षा-जल (निषिक्तम्) सिंच जाता है ॥२॥
Essence
जो यह भूमि पर स्थित जल सूर्य के ताप से अन्तरिक्ष में जाकर मेघ बनता है और फिर भूमि पर बरस जाता है, वह सब जगदीश्वर का ही कर्तृत्व है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में वर्षा-वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा दर्शाते हैं।

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