Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1602

1875 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गा꣢व꣣ उ꣡प꣢ वदाव꣣टे꣢ म꣣ही꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ र꣣प्सु꣡दा꣢ । उ꣣भा꣡ कर्णा꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡या꣢ ॥१६०२॥

गा꣡वः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । व꣣द । अवटे꣢ । म꣣ही꣡इति꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । र꣣प्सु꣡दा꣢ । र꣣प्सु꣢ । दा꣣ । उ꣡भा । क꣡र्णा꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡या꣢ ॥१६०२॥

Mantra without Swara
गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥

गावः । उप । वद । अवटे । महीइति । यज्ञस्य । रप्सुदा । रप्सु । दा । उभा । कर्णा । हिरण्यया ॥१६०२॥

Samveda - Mantra Number : 1602
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे मानव ! उपासना-यज्ञ में तू (अवटे) आनन्द-रसों के कूप अग्नि परमेश्वर के विषय में (गावः) वेद-वाणियों को (उपवद) समीपता के साथ उच्चारण कर। (मही) महान् द्यावापृथिवी(यज्ञस्य) पूजनीय परमात्मा की (रप्सु-दा) कीर्ति गान करनेवाली हैं, (उभा) जो दोनों (कर्णा) विविध ऐश्वर्यों को बिखेरनेवाली तथा (हिरण्यया) ज्योतिर्मय हैं ॥१॥
Essence
ऐश्वर्यों से परिपूर्ण देदीप्यमान द्यु-लोक और पृथिवी-लोक जगदीश्वर की ही महिमा का गान करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ११७ क्रमाङ्क पर पहले की जा चुकी है। यहाँ अन्य व्याख्या देते हैं।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.