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Samveda Mantra 1431

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥

आ꣣मा꣡सु꣢ । प꣣क्व꣢म् । ऐ꣡र꣢꣯यः । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दिवि꣢ । घ꣣र्म꣢म् । न । सा꣡म꣢꣯न् । त꣣पता । सुवृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । गि꣡र्व꣢꣯णसे । गिः । व꣣नसे । बृहत् ॥१४३१॥

Mantra without Swara
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यꣳ रोहयो दिवि । घर्मं न सामं तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत् ॥

आमासु । पक्वम् । ऐरयः । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । घर्मम् । न । सामन् । तपता । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । जुष्टम् । गिर्वणसे । गिः । वनसे । बृहत् ॥१४३१॥

Samveda - Mantra Number : 1431
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

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Meaning
हे इन्द्र जगदीश्वर ! आपने (आमासु) अपरिपक्व ओषधियों में (पक्वम्) पका फल, अथवा (आमासु) अपरिपक्व गायों में (पक्वम्) पका दूध (ऐरयः) प्रेरित किया है, (दिवि) आकाश में (सूर्यम्) सूर्य को (आरोहयः) चढ़ाया है। हे मनुष्यो ! तुम (गिर्वणसे) वाणियों से संभजनीय इन्द्र जगदीश्वर के लिए (जुष्टम्) प्रिय (बृहत्) महान् (सामन्) स्तोत्र को (घर्मम् न) अग्नि के समान (तपत) परिपक्व और प्रकाशित करो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
तपस्या से पका हुआ ही स्तोत्र परमात्मा के चित्त को आकृष्ट करता है और फलदायक होता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में उपास्य-उपासक का विषय है।

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