Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1396

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥१३९६॥

अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । ज꣣ङ्घनत् । द्रविणस्युः꣢ । वि꣣पन्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । शुक्रः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तः ॥१३९६॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः । वृत्राणि । जङ्घनत् । द्रविणस्युः । विपन्यया । समिद्धः । सम् । इद्धः । शुक्रः । आहुतः ॥१३९६॥

Samveda - Mantra Number : 1396
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 3;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
(विपन्यया) शिष्यों के विनय-व्यवहार से (समिद्धः) प्रोत्साहित, (शुक्रः) पवित्र हृदयवाला, (आहुतः) शिष्यों से आत्मसमर्पण किया हुआ (अग्निः) विद्या से प्रकाशित आचार्य (द्रविणस्युः) शिष्यों को विद्याधन देने का इच्छुक होता हुआ, उनके (वृत्राणि) दोषों को (जङ्घनत्) अतिशयरूप से नष्ट करे ॥१॥
Essence
गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे विद्या देने के साथ-साथ शिष्यों को भी दूर करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ आचार्य का विषय कहते हैं।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.