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Samveda Mantra 1388

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣢ वी꣣रो꣡ द꣢क्ष꣣सा꣡ध꣢नो꣣ वि꣢꣫ यस्त꣣स्त꣢म्भ꣣ रो꣡द꣢सी । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अव्यत वे꣣धा꣡ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८८॥

सः । वी꣣रः꣢ । द꣣क्षसा꣡ध꣢नः । द꣣क्ष । सा꣡ध꣢꣯नः । वि । यः । त꣣स्त꣡म्भ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣व्यत । वेधाः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१३८८॥

Mantra without Swara
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी । हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम् ॥

सः । वीरः । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः । वि । यः । तस्तम्भ । रोदसीइति । हरिः । पवित्रे । अव्यत । वेधाः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१३८८॥

Samveda - Mantra Number : 1388
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

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Meaning
(सः) वह (वीरः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं को कम्पायमान करनेवाला वीर सोम परमेश्वर (दक्षसाधनः) बल का साधक है, (यः) जो (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है। (वेधाः न) सूर्य के समान वह (हरिः) पापहर्ता परमेश्वर (योनिम्) आत्मा-रूप घर में (आसदम्) बैठने के लिए (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (अव्यत) आता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जो बलवान् जगदीश्वर सब संसार को धारण करता है, उसकी उपासना से सीमित शक्तिवाला भी मनुष्य महान् शक्तिवाला और शत्रुओं को हराने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर का महत्त्व वर्णित है ॥

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