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Samveda Mantra 1206

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣣सवे꣢ त꣣ उ꣡दी꣢रते ति꣣स्रो꣡ वाचो꣢꣯ मख꣣स्यु꣡वः꣢ । य꣢꣫दव्य꣣ ए꣢षि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१२०६॥

प्र꣣सवे । प्र꣣ । सवे꣢ । ते꣣ । उ꣣त् । ई꣢रते । तिस्रः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । म꣣खस्यु꣡वः꣢ । यत् । अ꣡व्ये꣢꣯ । ए꣡षि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१२०६॥

Mantra without Swara
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः । यदव्य एषि सानवि ॥

प्रसवे । प्र । सवे । ते । उत् । ईरते । तिस्रः । वाचः । मखस्युवः । यत् । अव्ये । एषि । सानवि ॥१२०६॥

Samveda - Mantra Number : 1206
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 4;

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Meaning
हे सोम अर्थात् रस के भण्डार परमात्मन् ! (ते प्रसवे) ध्यान द्वारा आपका आविर्भाव होने पर (मखस्युवः) उपासना-यज्ञ की पूर्ति चाहनेवाले उपासक लोग (तिस्रः वाचः) ऋग्, यजुः, साम रूप तीनों वाणियों को (उदीरते) उच्चारित करते हैं, (यत्) जबकि, आप (अव्ये सानवि) जीवात्मा के उन्नत धाम में (एषि) पहुँचते हो ॥२॥
Essence
सबके अन्तरात्मा में पहले से ही विद्यमान परमात्मा को ध्यान द्वारा और वेदमन्त्रों के गान द्वारा प्रकट करना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के आविर्भाव का वर्णन है।

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