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Samveda Mantra 119

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ वाजयामसि म꣣हे꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । स꣡ वृषा꣢꣯ वृष꣣भो꣡ भु꣢वत् ॥११९॥

त꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वा꣣जयामसि । महे꣢ । वृ꣣त्रा꣡य꣢ । ह꣡न्त꣢꣯वे । सः । वृ꣡षा꣢꣯ । वृ꣣षभः꣢ । भु꣣वत् ॥११९॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे । स वृषा वृषभो भुवत् ॥

तम् । इन्द्रम् । वाजयामसि । महे । वृत्राय । हन्तवे । सः । वृषा । वृषभः । भुवत् ॥११९॥

Samveda - Mantra Number : 119
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (महे) विशाल, (वृत्राय) सूर्यप्रकाश और जल-वृष्टि को रोकनेवाले मेघ के समान धर्म के बाधक पाप को (हन्तवे) नष्ट करने के लिए (तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) महापराक्रमी परमात्मा की हम (वाजयामसि) पूजा करते हैं। (वृषा) वर्षक (सः) वह परमेश्वर (वृषभः) धर्म की वर्षा करनेवाला (भुवत्) होवे ॥५॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (महे वृत्राय) महान् शत्रु को (हन्तवे) मारने के लिए, हम (तम्) प्रजा से निर्वाचित उस (इन्द्रम्) अत्यन्त वीर राजा को (वाजयामसि) सहायता-प्रदान द्वारा बलवान् बनाते हैं, अथवा उत्साहित करते हैं। (वृषा) मेघतुल्य (सः) वह राजा (वृषभः) शत्रुओं के ऊपर आग्नेयास्त्रों की और प्रजा के ऊपर सुखों की वर्षा करनेवाला (भुवत्) होवे ॥५॥ इस मन्त्र में वृषा, वृष में छेकानुप्रास अलङ्कार है। वृषा वृषभः दोनों शब्द बैल के वाचक होने से पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार भी है, यौगिक अर्थ करने से प्रतीयमान पुनरुक्ति का समाधान हो जाता है ॥५॥
Essence
अनावृष्टि के दिनों में बादल जैसे सूर्य के प्रकाश को और जल को नीचे आने से रोककर भूमि पर अन्धकार और अवर्षण उत्पन्न कर देता है, वैसे ही पापविचार और पापकर्म भूमण्डल में प्रसार प्राप्त कर सत्य के प्रकाश को और धर्मरूप स्वच्छ जल को रोककर असत्य का अन्धकार और अधर्मरूप अवर्षण उत्पन्न कर देते हैं। इन्द्र नामक परमेश्वर जैसे मेघरूप वृत्र को मारकर सूर्य के प्रकाश को तथा वर्षाजल को निर्बाधगति से भूमि के प्रति प्रवाहित करता है, वैसे ही पापरूप वृत्र का विनाश कर संसार में सत्य के प्रकाश को और धर्म की वर्षा को मुक्तहस्त से प्रवाहित करे, जिससे सब भूमण्डल-निवासी लोग सत्य-ज्ञान और सत्य-आचरण में तत्पर तथा धार्मिक होकर अत्यन्त सुखी हों। इसी प्रकार राष्ट्र में राजा का भी कर्त्तव्य है कि दुष्ट शत्रुओं को विनष्ट कर सुख उत्पन्न करे ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में स्तोता लोग और प्रजाजन कह रहे हैं।

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