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Samveda Mantra 1118

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वृषगणो वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स꣡ यो꣢जत उरुगा꣣य꣡स्य꣢ जू꣣तिं꣢ वृथा꣣ क्री꣡ड꣣न्तं मिमते꣣ न꣡ गावः꣢꣯ । प꣣रीणसं꣡ कृ꣢णुते ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गो꣣ दि꣢वा꣣ ह꣢रि꣣र्द꣡दृ꣢शे꣣ न꣡क्त꣢मृ꣣ज्रः꣢ ॥१११८॥

सः । यो꣣जते । उरुगाय꣡स्य꣢ । उ꣣रु । गाय꣡स्य꣢ । जू꣣ति꣢म् । वृ꣡था꣢꣯ । क्री꣡ड꣢꣯न्तम् । मि꣣मते । न꣢ । गा꣡वः꣢꣯ । प꣣रीणस꣢म् । प꣣रि । नस꣢म् । कृ꣣णुते । तिग्म꣡शृ꣢ङ्गः । तिग्म꣢ । शृ꣣ङ्गः । दि꣡वा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । द꣡दृ꣢꣯शे । न꣡क्त꣢꣯म् । ऋ꣣ज्रः꣢ ॥१११८॥

Mantra without Swara
स योजत उरुगायस्य जूतिं वृथा क्रीडन्तं मिमते न गावः । परीणसं कृणुते तिग्मशृङ्गो दिवा हरिर्ददृशे नक्तमृज्रः ॥

सः । योजते । उरुगायस्य । उरु । गायस्य । जूतिम् । वृथा । क्रीडन्तम् । मिमते । न । गावः । परीणसम् । परि । नसम् । कृणुते । तिग्मशृङ्गः । तिग्म । शृङ्गः । दिवा । हरिः । ददृशे । नक्तम् । ऋज्रः ॥१११८॥

Samveda - Mantra Number : 1118
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

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Meaning
(सः) वह सोम चन्द्रमा (उरुगायस्य) विस्तीर्ण ग्रहोपग्रहों में जिसका प्रकाश पहुँचता है, ऐसे सूर्य के (जूतिम्) वेगवान् किरणसमूह को (योजते) अपने साथ जोड़ता है। (वृथा) अनायास (क्रीडन्तम्) भूमि और सूर्य के चारों ओर क्रीड़ा करनेवाले उस चन्द्रमा को (गावः) सूर्यकिरणें (न मिमते) सम्पूर्ण रूप में व्याप्त नहीं करतीं, किन्तु जितने भाग में सूर्यकिरणें पहुँचती हैं, चन्द्रमा का उतना ही भाग प्रकाशित होता है। तो भी कभी-कभी (तिग्मशृङ्गः) तीक्ष्ण किरणोंवाला सूर्य चन्द्रमा को (परीणसम्) परि व्याप्त (कृणुते) कर लेता है, तब पूर्णिमा में चन्द्रमा पूर्णतः प्रकाशित हो जाता है। वह चन्द्रमा (दिवा) दिन में (हरिः) हरा-काला सा (ददृशे) दिखाई देता है, (नक्तम्) रात्रि में (ऋज्रः) शुभ्र ॥३॥
Essence
पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती है और चन्द्रमा पृथिवी के चारों ओर घूमता-घूमता पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है। चन्द्रमा सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है। चन्द्रमा की जितनी कलाओं पर सूर्य-किरणें पहुँचती हैं, उतनी ही कलाएँ प्रकाशित दिखती हैं। प्रतिपदा को एक कला, द्वितीया को दो कलाएँ, तृतीया को तीन कलाएँ, अष्टमी को आठ कलाएँ, और पूर्णमासी को सब कलाएँ प्रकाशित होती हैं। अमावस्या को चन्द्रमा पर कहीं भी सूर्य-किरणों के न पहुँचने से सारा ही चन्द्र-मण्डल अन्धकार से ढका रहता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सूर्य-किरणें हमेशा चन्द्रमा के एक गोलार्ध पर ही पड़ती हैं, अतः दूसरे गोलार्ध में सदा अन्धेरा ही रहता है। गुरुओं को चाहिए कि चन्द्रमा के प्रकाशित होने का यह नियम तथा भूगोल और खगोल सम्बन्धी अन्य भी नियम शिष्यों को उपदेश करते रहें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में आचार्य शिष्यों को यह उपदेश दे रहा है कि चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है।

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