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Samveda Mantra 1098

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तं꣡ वः꣢ सखायो꣣ म꣡दा꣢य पुना꣣न꣢म꣣भि꣡ गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ ह꣣व्यैः꣡ स्व꣢दयन्त गू꣣र्ति꣡भिः꣢ ॥१०९८॥

त꣢म् । वः꣣ । सखायः । स । खायः । म꣡दा꣢꣯य । पु꣣नान꣢म् । अ꣣भि꣢ । गा꣣यत । शि꣡शु꣢꣯म् । न । ह꣡व्यैः꣢꣯ । स्व꣣दयन्त । गूर्ति꣡भिः꣢ ॥१०९८॥

Mantra without Swara
तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत । शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः ॥

तम् । वः । सखायः । स । खायः । मदाय । पुनानम् । अभि । गायत । शिशुम् । न । हव्यैः । स्वदयन्त । गूर्तिभिः ॥१०९८॥

Samveda - Mantra Number : 1098
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

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Meaning
हे (सखायः) साथियो ! (वः मदाय) अपनी आनन्दप्राप्ति एवं उत्साहप्राप्ति के लिए, तुम (तम्) उस प्रसिद्ध (पुनानम्) पवित्र करनेवाले जगत्पति सोम परमेश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (गायत) स्तुतिगीत गाओ। अन्य लोग भी उसे (गूर्तिभिः) अपने पुरुषार्थों से (स्वदयन्त) प्रसन्न किया करें, (शिशुं न) जैसे शिशुरूप यज्ञाग्नि को (हव्यैः) हवियों से तृप्त किया जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे यज्ञाग्नि हवियों से जागता है, वैसे परमात्मा मनुष्य के पुरुषार्थों से प्रसन्न होता है। सबको चाहिए कि उसके स्तुतिगीत गाते हुए अपने जीवन को उन्नत करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५६९ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ भी प्रकारान्तर से उसी विषय का वर्णन करते हैं।

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