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Samveda Mantra 1096

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋणंचयो राजर्षिः Chhand- यवमध्या गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ सु꣢न्वे꣣ यो꣡ वसू꣢꣯नां꣣ यो꣢ रा꣣या꣡मा꣢ने꣣ता꣡ य इडा꣢꣯नाम् । सो꣢मो꣣ यः꣡ सु꣢क्षिती꣣ना꣢म् ॥१०९६॥

सः꣢ । सु꣣न्वे । यः꣡ । व꣡सू꣢꣯नाम् । यः । रा꣡या꣢म् । आ꣣नेता꣢ । आ꣣ । नेता꣢ । यः । इ꣡डा꣢꣯नाम् । सो꣡मः꣢꣯ । यः । सु꣣क्षितीना꣢म् । सु꣣ । क्षितीना꣢म् ॥१०९६॥

Mantra without Swara
स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम् । सोमो यः सुक्षितीनाम् ॥

सः । सुन्वे । यः । वसूनाम् । यः । रायाम् । आनेता । आ । नेता । यः । इडानाम् । सोमः । यः । सुक्षितीनाम् । सु । क्षितीनाम् ॥१०९६॥

Samveda - Mantra Number : 1096
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

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Meaning
(सः सोमः) वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (सुन्वे) सब जगत् को उत्पन्न करता है, (यः) जो (रायाम्) विद्या, आरोग्य, सत्य, अहिंसा, न्याय, वैराग्य आदि धनों का, (यः) जो (इडानाम्) गायों और भूमियों का, (यः) और जो (सुक्षितीनाम्) जिनमें उत्कृष्ट मनुष्य निवास करते हैं, उन राष्ट्रों का (आनेता) लानेवाला है ॥१॥
Essence
परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कौन चाँदी, सोना, भूमि, अन्तरिक्ष, नदी, समुद्र, अग्नि, वायु, जल, विद्युत्, सूर्य, वृक्ष, वनस्पति, मनुष्य, गाय, घोड़े आदि जड़-चेतन पदार्थों का, वेदविद्या, सत्य, अहिंसा आदि गुणों का और धार्मिक जनों का उत्पन्न करनेवाला हो सकता है ? इस कारण उसकी हमें कृतज्ञतापूर्वक प्रशंसा, वन्दना और पूजा करनी चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५८२ पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भी वही विषय वर्णित है।

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