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Samveda Mantra 1041

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣣मुद्रो꣢ अ꣣प्सु꣡ मा꣢मृजे विष्ट꣣म्भो꣢ ध꣣रु꣡णो꣢ दि꣣वः꣢ । सो꣡मः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अस्म꣣युः꣢ ॥१०४१॥

स꣣मुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । अ꣣प्सु꣢ । मा꣣मृजे । विष्टम्भः꣢ । वि꣣ । स्तम्भः꣢ । ध꣣रु꣡णः꣢ । दि꣣वः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣स्मयुः꣢ ॥१०४१॥

Mantra without Swara
समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो धरुणो दिवः । सोमः पवित्रे अस्मयुः ॥

समुद्रः । सम् । उद्रः । अप्सु । मामृजे । विष्टम्भः । वि । स्तम्भः । धरुणः । दिवः । सोमः । पवित्रे । अस्मयुः ॥१०४१॥

Samveda - Mantra Number : 1041
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

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Meaning
(समुद्रः) आनन्द-रसों को उमड़ानेवाला, (विष्टम्भः) सबको सहारा देनेवाला, (दिवः) सूर्य को (धरुणः) थामनेवाला, (अस्मयुः) हमसे प्रीति करनेवाला (सोमः) जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पवित्रे) वायु में और (अप्सु) जलों में (मामृजे) नित्य शुद्धि करता रहता है ॥५॥
Essence
यदि जल, वायु आदि प्राकृतिक पदार्थों को सूर्य द्वारा प्रतिदिन जगदीश्वर शुद्ध न करता रहता तो मलों के पुञ्ज होकर वे किसी के उपयोग के योग्य भी न रहते ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का शुद्धिकार्य वर्णित है।

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