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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 5

104 Sukta
27 Mantra
7/32/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श्रव॒च्छ्रुत्क॑र्ण ईयते॒ वसू॑नां॒ नू चि॑न्नो मर्धिष॒द्गिरः॑। स॒द्यश्चि॒द्यः स॒हस्रा॑णि श॒ता दद॒न्नकि॒र्दित्स॑न्त॒मा मि॑नत् ॥५॥

श्रव॑त् । श्रुत्ऽक॑र्णः । ई॒य॒ते॒ । वसू॑नाम् । नु । चि॒त् । नः॒ । म॒र्धि॒ष॒त् । गिरः॑ । स॒द्यः । चि॒त् । यः । स॒हस्रा॑णि । स॒ता । दद॑त् । नकिः॑ । दित्स॑न्तम् । आ । मि॒न॒त् ॥

Mantra without Swara
श्रवच्छ्रुत्कर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मर्धिषद्गिरः। सद्यश्चिद्यः सहस्राणि शता ददन्नकिर्दित्सन्तमा मिनत् ॥

श्रवत्। श्रुत्ऽकर्णः। ईयते। वसूनाम्। नु। चित्। नः। मर्धिषत्। गिरः। सद्यः। चित्। यः। सहस्राणि। सता। ददत्। नकिः। दित्सन्तम्। आ। मिनत् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
(यः) जो (श्रुत्कर्णः) श्रुति में कान रखनेवाला (सद्यः) शीघ्र (श्रवत्) सुने (नः) हमारे (वसूनाम्) धनों के सम्बन्ध में (गिरः) अच्छी शिक्षा की भरी हुई वाणियों को (चित्) भी (नु) शीघ्र (मर्धिषत्) चाहे (सहस्राणि) हजारों (शता) सैकड़ों पदार्थों को (ददत्) देता और (ईयते) पहुँचाता है (दित्सन्तम्) देना चाहते हुए को (नकिः) नहीं (आ, मिनत्) विनाशे (चित्) वही सर्वदा सुखी होता है ॥५॥
Essence
जो दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से सब विद्याओं को सुनते, अच्छी शिक्षायुक्त वाणियों को चाहते और औरों को अतुल विज्ञान देते हैं, वे दुःख नहीं पाते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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